देश भगत विश्वविद्यालय में महाराजा रणजीत सिंह पर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित

मंडी गोबिंदगढ़, 15 मार्च (रूप नरेश): देश भगत विश्वविद्यालय, मंडी गोबिंदगढ़ के दक्षिण एशियाई अध्ययन केंद्र तथा सामाजिक विज्ञान और भाषा संकाय द्वारा संयुक्त रूप से “महाराजा रणजीत सिंह और उनका युग: पुनर्विचार” विषय पर एक दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया गया। इस सम्मेलन में भारत और विदेशों से प्रतिष्ठित इतिहासकारों, शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं और विद्वानों ने भाग लिया।

कार्यक्रम की शोभा कुलाधिपति डॉ. ज़ोरा सिंह, प्रो-कुलाधिपति डॉ. तजिंदर कौर, कुलपति प्रो. हर्ष सदावर्ती, प्रो-कुलपति प्रो. अमरजीत सिंह, विशेष मुख्य अतिथि पद्मश्री प्रो. रघुवेंद्र तनवर, मुख्य अतिथि सरदार हरप्रीत सिंह साहनी (सीईओ, पीटीसी न्यूज़) तथा मुख्य वक्ता प्रो. हरजिंदर सिंह दिलगीर की उपस्थिति से बढ़ी।
सामाजिक विज्ञान और भाषा संकाय की प्रभारी डॉ. रेनू शर्मा ने सभी गणमान्य अतिथियों और प्रतिभागियों का स्वागत किया। सम्मेलन के निदेशक प्रो. राम सिंह गुरना ने महाराजा रणजीत सिंह के जीवन, शासन और ऐतिहासिक महत्व के पुनर्मूल्यांकन के उद्देश्य पर प्रकाश डाला।

अपने संबोधन में डॉ. ज़ोरा सिंह ने महाराजा रणजीत सिंह के दूरदर्शी नेतृत्व, न्याय-प्रधान शासन और धार्मिक सद्भाव के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को रेखांकित किया। डॉ. तजिंदर कौर ने उनके शासन को एकता, समावेशिता और प्रगतिशील प्रशासन का प्रतीक बताया। प्रो. अमरजीत सिंह ने महाराजा के संतुलित नेतृत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि उन्होंने सैन्य शक्ति के साथ-साथ कूटनीतिक बुद्धिमत्ता का भी सफलतापूर्वक समन्वय किया।
पद्मश्री प्रो. रघुवेंद्र तनवर ने कहा कि महाराजा रणजीत सिंह पंजाब के लोगों से गहराई से जुड़े हुए शासक थे और उन्होंने एक ऐसा समावेशी राज्य स्थापित किया, जहाँ विभिन्न समुदायों के लोग मिलकर सेवा करते थे। मुख्य अतिथि सरदार हरप्रीत सिंह साहनी ने शक्तिशाली साम्राज्य की स्थापना में महाराजा के साहस, दृढ़ संकल्प और निडर नेतृत्व को रेखांकित किया।
मुख्य वक्ता प्रो. हरजिंदर सिंह दिलगीर ने महाराजा के शासनकाल के दौरान हुए राजनीतिक घटनाक्रमों तथा ब्रिटिश प्रभाव के विस्तार के विरुद्ध उनकी रणनीतिक प्रतिरोध नीति पर विस्तृत व्याख्यान प्रस्तुत किया।
सम्मेलन में चार तकनीकी सत्र आयोजित किए गए, जिनमें महाराजा रणजीत सिंह के जीवन, प्रशासन, कूटनीति, सैन्य रणनीति और सामाजिक-सांस्कृतिक योगदान से संबंधित 62 शोध पत्र प्रस्तुत किए गए।
समापन सत्र में (जी.एन.डी.) गुरु नानक देव विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. सुखदेव सिंह सोहल ने वैलेडिक्टरी संबोधन दिया, जबकि सत्र की अध्यक्षता केंद्रीय श्री गुरु सिंह सभा, चंडीगढ़ के महासचिव डॉ. खुशहाल सिंह ने की। उद्घाटन सत्र में धन्यवाद प्रस्ताव डॉ. सुरजीत कौर पथेजा ने प्रस्तुत किया तथा समग्र धन्यवाद ज्ञापन पंजाबी भाषा, लोक साहित्य और संस्कृति केंद्र के समन्वयक प्रो. धर्मिंदर सिंह ने किया। सम्मेलन का समापन सार्थक शैक्षणिक चर्चाओं और ऐतिहासिक शोध को प्रोत्साहित करने के लिए विश्वविद्यालय के प्रयासों की सराहना के साथ हुआ।
